Namaz Ke Faraiz: नमाज़ के 7 फ़र्ज़ और उनका आसान बयान

नमाज़ इस्लाम का सबसे अहम स्तंभ है और नमाज़ को सही तरीके से अदा करने के लिए उसके फ़र्ज़ों को जानना बेहद ज़रूरी है। जब तक नमाज़ के फ़र्ज़ पूरे नहीं होंगे, नमाज़ मुकम्मल नहीं मानी जाती।

अक्सर लोग नमाज़ तो पढ़ते हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि Namaz Ke Faraiz क्या क्या होते हैं और हर फ़र्ज़ का सही मतलब क्या है। इसी वजह से नमाज़ में कमी रह जाती है।

आज इस लेख में हम आपको नमाज़ के 7 फ़र्ज़ बहुत ही आसान, साफ़ और समझने लायक भाषा में बताएँगे, ताकि आप अपनी नमाज़ सही और मुकम्मल तरीके से अदा कर सकें।


Namaz Ke Faraiz

नमाज़ के कुल 7 फ़र्ज़ हैं, जो नीचे दिए गए हैं:

  1. तकबीर-ए-तहरीमा
  2. क़याम
  3. क़िराअत
  4. रुकू
  5. सज्दा
  6. क़अदा-ए-आख़िरा
  7. नमाज़ को पूरा करना (सलाम)

अब आइए, एक-एक फ़र्ज़ को विस्तार से समझते हैं।


1. पहला फ़र्ज़: तकबीर-ए-तहरीमा

नमाज़ की शुरुआत “अल्लाहु अकबर” कहकर करना तकबीर-ए-तहरीमा कहलाता है। यही वह अल्लाहु अकबर है, जिससे नमाज़ शुरू होती है।

नमाज़ में और भी कई बार अल्लाहु अकबर कहा जाता है, लेकिन शुरुआत वाला अल्लाहु अकबर ही फ़र्ज़ है। इसके बिना नमाज़ शुरू ही नहीं होती।

तकबीर-ए-तहरीमा से पहले ये शर्तें पूरी होना ज़रूरी हैं:

  • पाकी (तहारत)
  • सतर-ए-औरत ढका होना
  • क़िब्ले की तरफ़ रुख
  • नमाज़ का सही वक़्त
  • दिल से नियत

अगर अल्लाहु अकबर कह दिया और कोई शर्त बाकी रह गई, तो नमाज़ नहीं होगी। जो व्यक्ति बोलने में सक्षम न हो, उसके लिए दिल से इरादा करना काफ़ी है।


2. दूसरा फ़र्ज़: क़याम

क़याम का मतलब है नमाज़ में खड़ा होना।

जो शख़्स खड़े होने की ताक़त रखता है, उसके लिए फ़र्ज़ नमाज़ में खड़ा होना ज़रूरी है। आलस या लापरवाही की वजह से बैठकर नमाज़ पढ़ना जायज़ नहीं।

क़याम में:

  • सीधा खड़ा होना चाहिए
  • बहुत ज़्यादा झुकना या टेढ़ा होना नहीं चाहिए
  • क़िराअत पूरी होने तक खड़े रहना ज़रूरी है

जो शख़्स बीमारी या कमजोरी की वजह से खड़ा नहीं हो सकता, उस पर क़याम फ़र्ज़ नहीं।


3. तीसरा फ़र्ज़: क़िराअत

क़िराअत का मतलब है क़ुरआन पढ़ना। नमाज़ में क़िराअत इस तरह होनी चाहिए कि:

  • हर हर्फ़ सही मख़राज से अदा हो
  • इतनी आवाज़ में पढ़ें कि खुद सुन सकें

फ़र्ज़ नमाज़ में सूरह फ़ातिहा पूरी पढ़ना वाजिब है। अगर एक हर्फ़ भी छूट जाए, तो नमाज़ में कमी आ जाती है।

अगर क़िराअत खुद को सुनाई न दे, तो नमाज़ नहीं होगी। इमाम के पीछे नमाज़ पढ़ने वाले को क़िराअत नहीं करनी चाहिए।


4. चौथा फ़र्ज़: रुकू

रुकू का मतलब है इतना झुकना कि हाथ घुटनों तक पहुँच जाएँ।

रुकू का सही तरीका:

  • पीठ सीधी हो
  • सिर और पीठ एक लाइन में हों

कम से कम एक बार रुकू करना फ़र्ज़ है। रुकू में “सुब्हान रब्बियल अज़ीम” तीन बार कहना सुन्नत है।


5. पाँचवाँ फ़र्ज़: सज्दा

हर रकअत में दो सज्दे करना फ़र्ज़ है। सज्दे में ये अंग ज़मीन से लगना ज़रूरी हैं:

  • पेशानी
  • नाक
  • दोनों हथेलियाँ
  • दोनों घुटने
  • पैरों की उँगलियाँ

अगर पैरों की उँगलियाँ ज़मीन से न लगें, तो नमाज़ नहीं होगी हदीस में आता है कि बंदा अपने रब के सबसे क़रीब सज्दे में होता है सज्दे में “सुब्हान रब्बियल अअला” कम से कम तीन बार कहना सुन्नत है।


6. छठा फ़र्ज़: क़अदा-ए-आख़िरा

क़अदा-ए-आख़िरा का मतलब है नमाज़ के आख़िर में बैठना।

आख़िरी रकअत में इतनी देर बैठना फ़र्ज़ है कि पूरा तशह्हुद अत्तहियात पढ़ लिया जाए। अगर क़अदा-ए-आख़िरा भूल जाएँ, तो नमाज़ नहीं होगी।

तशह्हुद के बाद:

  • दुरूद-ए-इब्राहीम
  • दुआ-ए-मासूरा
    पढ़ना सुन्नत है।

7. सातवाँ फ़र्ज़: नमाज़ पूरी करना

नमाज़ को सलाम फेरकर खत्म करना आख़िरी फ़र्ज़ है।

नमाज़ से बाहर आने के लिए:

  • “अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह” कहना सुन्नत है

सलाम फेरते वक्त यह नियत रखें कि:

  • दाईं और बाईं तरफ़ मौजूद फ़रिश्तों को सलाम कर रहे हैं।

आख़िरी नसीहत

मेरे प्यारे मोमिनों, अब आप अच्छी तरह से Namaz Ke Faraiz समझ चुके होंगे और हर फ़र्ज़ कितना अहम है ये भी जान गए होंगे अगर फ़र्ज़ पूरे होंगे, तभी नमाज़ अल्लाह के यहाँ क़ुबूल होगी।

अगर इस लेख से आपको फायदा हुआ हो, तो इसे दूसरों तक ज़रूर पहुँचाएँ, ताकि हर मुसलमान अपनी नमाज़ सही तरीके से अदा कर सके।

अगर कहीं कोई बात समझ न आए या आपको किसी गलती का एहसास हो, तो कॉमेंट करके ज़रूर बताइए। अल्लाह हमें सही नमाज़ पढ़ने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।